गंगा नदी के पृथ्वी पर आने की कहानी Ganga Nadi or Raja Bhagirath ki Kahani

गंगा नदी के पृथ्वी पर आने की कहानी Ganga Nadi or Raja Bhagirath ki Kahani

Ganga Nadi or Raja Bhagirath ki Kahani
भगवान श्री राम के पूर्वज सूर्यवंशी राजा सगर थे, वे बड़े ही धर्मपरायण और न्यायप्रिय राजा थे। राजा सगर की दो पत्नियाँ थी, जिनका नाम केशनी और सुमति था। राजा सगर के पास हर तरह का वैभव था, परनतु उन्हें केवल एक ही चिंता सताती रहती थी की उनके कोई संतान नहीं थी। तब राजा सगर ने संतान प्राप्ति के लिए भगवान शिव की तपस्या करने का निश्चय किया। राजा सगर अपनी दोनों पत्नियों केशनी और सुमति को साथ लेकर वन में तपस्या करने चले गए। वन में उन तीनों ने मिलकर भगवान शिव की घोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव उनके सामने प्रकट हो गए। भगवान शिव ने रानी केशनी को वरदान दिया की उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति होगी जो राजा सगर के वंश को आगे बढ़ाएगा। और रानी सुमति को भगवान शिव ने वरदान दिया की उन्हें साठ हजार पुत्रों की प्राप्ति होगी।

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भगवान शिव से वरदान प्राप्त होने के के बाद राजा सगर अपनी दोनों पत्नियों के साथ अपनी राजधानी आयोध्या लौट आये, कुछ समय बाद रानी केशनी को एक पुत्र की प्राप्ति हुई, इस पुत्र का नाम असमंजस रखा गया। उसी समय रानी सुमति के गर्भ से पुत्र के स्थान पर एक तुंबा प्रकट हुआ। इस तुंबा में साठ हजार पुत्रों के बीज थे, इस तुंबा को घृत से भरे घड़े में संवर्धित किया गया जिससे साठ हजार पुत्र उत्पन्न हुए। साठ हजार पुत्रों के जन्म लेने पर राजा सगर अत्यंत प्रसन्न हो गए। उन्होंने पुरे राज्य में उत्सव मनाने की घोषणा कर दी। राजकुमारों के जन्म के अवसर पर पुरे राज्य में भव्य उत्सव मनाया गया।

धीरे-धीरे सभी राजकुमार बड़े होने लगे, वे सभी राजकुमार एक से बढ़कर एक विद्याओ में पारंगत और वीर योद्धा हुए। रानी केशनी का पुत्र असमंजस स्वभाव से दुराचारी था, वह प्रजा पर अत्याचार करने लगा। राजा सगर अपने पुत्र असमंजस से बहुत दुखी रहा करते थे, राजा सगर ने राजकुमार असमंजस का यह सोच कर विवाह करवा दिया की शायद वह विवाह के बाद सुधर जायेगा, परन्तु ऐसा नहीं हुआ। असमंजस ने अपना स्वभाव नहीं छोड़ा और वह पहले की ही तरह प्रजा को परेशान करने लगा, इससे दुखी होकर राजा सगर ने राजकुमार असमंजस को अपने राज्य से निर्वासित कर दिया।

समय से साथ राजा सगर के साठ हजार पुत्रों ने दसों दिशाओं में अपने पराक्रम के झंडे गाड़ दिए, उनसे युद्ध करने का साहस किसी में नहीं था। राजा सगर के साठ हजार पुत्र अपने आप में एक विशाल और शक्तिशाली सेना के समान थे। अपने बलशाली पुत्रों को देखकर राजा सगर हर्षित होने लगे। दूसरी तरफ राज्य से निर्वासित होने के बाद राजकुमार असमंजस को अपनी पत्नी से एक पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम अंशुमान रखा गया। बड़ा होने पर असमंजस का पुत्र अंशुमान सदाचारी और पराक्रमी हुआ।

एक दिन राजा सगर ने अपने राज्य का विस्तार करने के लिए अश्वमेघ यज्ञ करने का विचार किया। इसके बाद राजा सगर ने एक भव्य यज्ञ मंडप का निर्माण करवाया, जहाँ पर उन्होंने अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन किया। एक तरफ राजा सगर यज्ञ में आहुतियां डाल रहे थे, तो दूसरी तरफ सेना के साथ यज्ञ का घोडा रवाना किया गया। यज्ञ का घोडा कई राज्यों की सीमाओं में से होकर गुजरा, उनमें से किसी भी राज्य के राजा ने यज्ञ के घोड़े को रोकने का साहस नहीं किया, क्योकि यज्ञ के घोड़े को रोकने का अर्थ था अयोध्या की शक्तिशाली सेना से युद्ध करना। कोई भी राजा अयोध्या की सेना से युद्ध नहीं करना चाहता था इसलिए लगभग सभी राजाओं ने अयोध्या के राजा सगर की मित्रता स्वीकार कर ली।

राजा सगर का अश्वमेघ यज्ञ पूरा होने वाला था, तब स्वर्ग के राजा इंद्र को अपना सिंघासन जाने का खतरा सताने लगा। इंद्र ने राजा सगर के अश्वमेघ यज्ञ को पूरा होने से रोकने के लिए रात्रि के अंधकार में यज्ञ के घोड़े को कपिल मुनि के आश्रम में छिपा दिया। अगले दिन सुबह जब यज्ञ का घोडा दिखाई नहीं दिया तब उसकी खोज शुरू की गयी। घोड़े को खोजने के लिए दसों दिशाओं में सेना की टुकड़ियाँ रवाना की गयी। बहुत खोज करने के बाद भी जब यज्ञ का घोडा नहीं मिला तब राजा सगर ने अपने साठ हजार पुत्रो को यज्ञ के घोड़े की खोज में भेजा। राजा सगर के पुत्रों ने भी दसों दिशाओं में घोड़े के खोज की, खोजते-खोजते राजा सगर के पुत्र कपिल मुनि के आश्रम पहुंचे। कपिल मुनि उस समय साधना में लीन थे। राजकुमारों ने आश्रम में खोज की तो उन्हें वहाँ यज्ञ का घोडा बँधा हुआ दिख गया। राजकुमारों ने सोचा कपिल मुनि ने उनके यज्ञ का घोडा चुराया है और अब वह साधना में लीन होने का ढोंग कर रहें है। यह सोचकर सभी राजकुमार कपिल मुनि को भला-बुरा कहने लगने और उन्हें चोर कहकर सम्बोधित करने लगे। कोलाहल सुनकर कपिल मुनि की साधना भंग हो गयी।

राजकुमारों को कपिल मुनि के तप सामर्थ्य का कोई बोध नहीं था, जैसे ही कपिल मुनि की साधना टूटी सभी राजकुमार उन्हें और अधिक अपशब्द कहने लगे उन्हें चोर-उचक्का कहकर पुकारने लगे, वे सभी कपिल मुनि को दंड देना चाहते थे। यह सब सुनकर कपिल मुनि अत्यंत क्रोधित हो गए। कपिल मुनि ने श्राप देकर उन सभी साठ हजार राजकुमारों को उसी क्षण जलाकर भस्म कर दिया। सभी राजकुमारों के भस्म होने की खबर जब राजा सगर को मिली तो उन्हें बहुत दुःख हुआ, और उनके पूरे राज्य में शोक की लहार छा गयी। तब राजा सगर ने अपने पौत्र अंशुमान को बुलाया और उन्हें कपिल मुनी के पास अपने पुत्रों की तरफ से उनसे क्षमा याचना करने के लिए भेजा।

अंशुमान कपिल मुनि के आश्रम पहुंचे और उन्हें प्रणाम किया तथा उनसे अपने चाचाओं की तरफ से क्षमा याचना की। साथ ही उन्होंने कपिल मुनि से अपने चाचाओं की मुक्ति का मार्ग भी पूछा। तब कपिल मुनि ने अंशुमान को बताया की केवल गंगाजी के पावन जल से तर्पण करने के बाद ही इन सभी को मुक्ति मिल सकती है। इतना कहकर कपिल मुनि ने अंशुमान को यज्ञ का घोडा लौटा दिया। घोडा लेकर अंशुमान राजा सगर के पास पहुंचे और उन्हें सारी बात कह सुनाई। इसके बाद दुखी मन से राजा सगर ने यज्ञ को पूरा किया। यज्ञ को पूरा करने के बाद राजा सगर ने अपना राज्य अंशुमान को सौंप दिया और स्वयं अपने पुत्रों की मुक्ति के लिए गंगाजी को धरती पर लाने के लिए वन में तपस्या करने चले गए।

राजा सगर ने कई वर्षों तक वन में ब्रह्माजी की घोर तपस्या की, तपस्या करते-करते ही राजा सगर स्वर्ग सिधार गए। जब यह बात राजा अंशुमान को पता चली तो उन्हें बहुत दुःख हुआ। इसके बाद राजा अंशुमान ने अपना राज-पाठ अपने पुत्र दिलीप को सौंप दिया और स्वयं तपस्या करने वन चले गए। अंशुमान ने भी गंगाजी को धरती पर लाने के लिए घोर तपस्या की परन्तु वे भी सफल नहीं हो सके और तपस्या करते-करते उनकी भी मृत्यु हो गयी। जब राजा दिलीप का पुत्र भगीरथ बड़ा हुआ तब राजा दिलीप ने अपना राज्य पुत्र भगीरथ को सौंप दिया और स्वयं घोर तपस्या करने वन चले गए। राजा दिलीप को भी इस कार्य में सफलता नहीं मिली और तपस्या करते-करते उनकी भी मृत्यु हो गयी।

भगीरथ के कोई संतान नहीं थी, इसलिए राजा भगीरथ ने अपना राज्य अपने मंत्रियों को सौंप दिया और स्वयं तपस्या करने हिमालय चले गए। राजा भगीरथ ने भी ब्रह्माजी की कई सालों तक घोर तपस्या की और अंततः ब्रह्माजी राजा भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न हो गए। ब्रह्माजी ने राजा भगीरथ से वरदान माँगने को कहा। तब भगीरथ ने कहा हे परमपिता ब्रह्माजी यदि आप मेरी तपस्या से प्रसन्न हैं तो मुझे यह वरदान दीजिये की मेरे पूर्वज महाराज सगर के साठ हजार पुत्रों को गंगाजी के पावन जल के द्वारा मुक्ति प्राप्त हो, साथ ही मुझे संतान प्राप्ति का भी वरदान दीजिये जिससे मेरा वंश आगे बढ़ सके। तब ब्रह्माजी बोले तुम्हारी संतान प्राप्ति की इच्छा अवश्य पूरी होगी परन्तु गंगाजी पृथ्वी पर अवतरित नहीं हो सकती, इसमें एक समस्या है। राजा भगीरथ ने पूछा गंगाजी के धरती पर अवतरित होने में क्या समस्या है। ब्रह्माजी बोले भगीरथ जब गंगाजी स्वर्ग लोक से पृथ्वी पर आएँगी तब उनका वेग इतना तीव्र होगा की पृथ्वी उसे संभाल नहीं सकेगी और गंगाजी पृथ्वी को चीरकर पाताल लोक चली जाएँगी। इसलिए गंगाजी के वेग को सँभालने के लिए तुम्हे पहले कठोर तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न करना होगा, केवल वे ही गंगाजी के वेग को संभाल सकते है। यह कहकर ब्रह्माजी अन्तर्ध्यान हो गए।

ब्रह्माजी की बात सुनकर राजा भगीरथ ने हार नहीं मानी, उन्होंने उसी समय से उसी स्थान पर भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या आरंभ कर दी। फिर कई वर्षों की कठोर तपस्या के बाद भगवान शिव प्रसन्न हो गए, भगवान शिव ने प्रकट होकर राजा भगीरथ से कहा हम तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हैं, इसलिए तुम्हारे मनोरथ को पूरा करने के लिए हम गंगाजी को अपने शीश पर धारण करेंगें। जब गंगाजी को पता चला की उन्हें पृथ्वी पर जाना है, तो वे अत्यंत क्रोधित हो गयी क्योकि वे देवलोक को छोड़कर पृथ्वी पर नहीं जाना चाहती थी। गंगाजी ने निश्चय किया की वे अपने प्रचंड वेग से भगवान शिव को भी बहाकर पाताल लोक ले जायेंगी। वे प्रचंड वेग से भगवान शिव के शीश पर उतरीं। भगवान शिव गंगाजी के अहंकार को भांप गए, भगवान शिव ने गंगाजी के वेग को अपनी जटाओं समेट लिया। गंगाजी पूरा प्रयास करने के बाद भी भगवान शिव की जटाओं से मुक्त नहीं हो सकीं।

जब राजा भगीरथ ने देखा की गंगाजी भगवान शिव की जटाओं में विलीन हो गयीं है, तब गंगाजी को भगवान शिव की जटाओ से मुक्त करवाने के लिए भगीरथ ने पुनः भगवान शिव की तपस्या की। राजा भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने गंगाजी को अपनी जटाओ से मुक्त कर दिया। मुक्त होकर गंगाजी की प्रचंड धारा राजा भगीरथ के पीछे-पीछे चलने लगी। भगीरथ गंगाजी की धारा को लेकर उस स्थान की तरफ बढ़ने लगे जहाँ उनके साठ हजार पूर्वज भस्म हो गए थे। गंगाजी की धरा भी उनके पीछे ही आ रही थी। उनके मार्ग में आने वाले सभी राजा, देव, दानव, यक्ष, किन्नर आदि गंगाजी का स्वागत कर रहे थे। जो भी गंगाजी के जल का स्पर्श करता उसका उद्धार हो जाता।

राजा भगीरथ गंगाजी को लेकर आगे बढ़ रहे थे, मार्ग में जाहनू ऋषि का आश्रम था, ऋषि अपने आश्रम में यज्ञ कर रहे थे, उसी समय गंगाजी की प्रचंड धरा में जाहनू ऋषि के यज्ञ समेत उनका पूरा आश्रम बह गया। यह देखकर ऋषि जाहनू अत्यंत क्रोधित हो गए। जाहनू ऋषि ने अंजलि भरकर गंगाजी का सारा जल पी लिया। जब राजा भगीरथ ने मार्ग में पीछे मुड़कर देखा तो उन्हें गंगाजी की धारा दिखाई नहीं दी। वे पुनः पीछे लौटे और जाहनू ऋषि के पास पहुंचे, उन्होंने जाहनू ऋषि को अपना उद्देश्य बताया और गंगाजी को मुक्त करने की विनती की। भगीरथ की विनती सुनकर जाहनू ऋषि ने आपने कान से गंगाजी की धारा को मुक्त कर दिया, जाहनू ऋषि ने गंगाजी को मुक्त किया था इसलिए गंगाजी को जाह्नवी भी कहा जाता है।

जब गंगाजी देवलोक से भगवन शिव की जटाओं में उतरी थी तब भगवान शिव ने उन्हें हिमालय स्थित गोमुख नाम के स्थान पर मुक्त किया था। गोमुख से भगीरथ गंगाजी को सर्वप्रथम हरिद्वार लाये थे, इसलिए आज भी मुक्ति के लिए हरिद्वार जाया जाता है। हरिद्वार से प्रयागराज, काशी, पाटलिपुत्र होते हुए राजा भगीरथ गंगाजी को कपिल मुनि के आश्रम लेकर आये थे, जहाँ उनके पूर्वजों को भस्म पड़ी थी (वह स्थान आज के पश्चिम बंगाल राज्य में स्थित है), भस्म से गंगाजी के पवित्र जल का स्पर्श पाते ही राजा भगीरथ के साठ हजार पूर्वजों को मुक्ति मिल गयी, यह देखकर राजा भगीरथ ने माँ गंगा को कोटि-कोटि नमन किया। महाराज सगर के पुत्रों को मुक्ति प्रदान करके गंगाजी की पवित्र धारा गंगासागर नाम के स्थान पर समुद्र में समा गयी। आज भी माँ गंगा की यह पवित्र धरा इसी मार्ग से अनवरत बह रही है और पतितों का उद्धार कर रहीं है। हर-हर गंगे।

 

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