Shree Badrinath Temple | श्री बद्रीनाथ मंदिर की जानकारी

श्री बद्रीनाथ मंदिर | Shree Badrinath Temple in Hindi

 

परिचय | Introduction

श्री बद्रीनाथ मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित एक अति प्रसिद्ध हिन्दू मंदिर है, यह मंदिर भारत के उत्तराखंड राज्य के चमोली जिले में नर और नारायण नाम के दो पर्वतों बिच में और अलखनंदा नदी के तट पर स्थित है। समुद्र तल से इस मंदिर की उचाई 3133 मीटर (10279 फुट) है। श्री बद्रीनाथ मंदिर से श्री केदारनाथ मंदिर की सीधी दुरी लगभग 41 किलोमीटर है। श्री बद्रीनाथ मंदिर हिन्दू धर्म के परम पवित्र चारधाम मंदिरों में से एक है, इनके अलावा पंचबद्री मंदिरों में भी इस मंदिर की गिनती की जाती है। श्री बद्रीनाथ मंदिर चारधामों में से प्रथम धाम माना जाता है, इस मंदिर की स्थापना सतयुग में की गयी थी।  इसके बाद दूसरा धाम श्री रामेश्वरम को माना जाता है, श्री रामेश्वरम धाम की स्थापना भगवान श्री राम ने त्रेता युग में की थी। श्री द्वारका को तीसरा धाम माना जाता है, इसकी स्थापना द्वापर युग में की गयी थी। श्री जगन्नाथपुरी को चौथा धाम माना जाता है, इसकी स्थापना कलयुग में की गयी थी।  

 

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Sri Badrinath Temple

श्री बद्रीनाथ मंदिर को श्री बद्रीनारायण और श्री बद्रीविशाल भी कहा जाता है। सतयुग में श्री बद्रीनाथ मंदिर को मुक्तिप्रदा कहा जाता था। त्रेतायुग में इसे योगसिद्ध कहा जाने लगा। द्वापर युग में इसे मणिभद्र आश्रम और विशाला तीर्थ कहा जाने लगा। तथा वर्तमान कलयुग में इसे बद्रीनाथ कहा जाता है। श्री बद्रीनाथ मंदिर के निकटवर्ती क्षेत्रों में भगवान विष्णु को समर्पित चार मंदिर और है, जिनके नाम योगध्यानबद्री, भविष्यबद्री, वृद्धबद्री, और आदिबद्री हैं। इस पांच मंदिरों के समूह को पंचबद्री कहा जाता है। श्री बद्रीनाथ को धरती का वैकुण्ठ भी कहा जाता है। 

 

श्री बद्रीनाथ मंदिर की पौराणिक कहानी

पौराणिक कथा अनुसार श्री बद्रीनाथ और श्री केदारनाथ का सम्पूर्ण क्षेत्र भगवान शिव का था, जिसे केदारखंड कहा जाता था। भगवान विष्णु अपने योग ध्यान के लिए उचित स्थान ढूंढ रहे थे। जब भगवान विष्णु ने इस स्थान को देखा, तो उन्हें यह स्थान बहुत पसंद आया, इसलिए भगवान विष्णु ने इस क्षेत्र में नीलकंठ पर्वत समीप बालरूप धारण किया और बालक की तरह रोने लगे। बालक का रुदन सुनकर देवी पार्वती का हृदय द्रवित हो गया और वे बालक के पास पहुंचकर उसे मानाने का प्रयास करने लगी। उसी समय बालक रूपी भगवान विष्णु ने देवी पार्वती से वह स्थान मांग लिया, जिसके बाद देवी पार्वती ने वह स्थान भगवान विष्णु को दे दिया। 

 

जब भगवान विष्णु उस स्थान पर तपस्या कर रहे थे, उस समय बहुत अधिक हिमपात होने लगा, भगवान विष्णु बर्फ में पूरी तरह से डूब चुके थे। भगवान विष्णु की इस दशा को देखकर देवी लक्ष्मी का ह्रदय द्रवित हो गया। देवी लक्ष्मी ने भगवान विष्णु के पास खड़े होकर एक बद्रीवृक्ष का रूप ले लिया और समस्त हिमपात को अपने ऊपर सहने लगी। भगवान विष्णु कई वर्षो तक तपस्या करते रहे, तब तक देवी लक्ष्मी बद्रीवृक्ष के रूप में भगवान विष्णु को वर्षा, धुप और हिमपात से बचाती रही। कई वर्षो बाद जब भगवान विष्णु ने अपनी तपस्या पूर्ण की तब उन्होंने देखा की देवी लक्ष्मी उनके समीप बद्रीवृक्ष के रूप में खड़ी है, और पूरी तरह बर्फ से ढकी हैं। तब उन्होंने देवी लक्ष्मी से कहा की हे देवी तुमने भी मेरे जितनी ही तपस्या की है, इसलिए इस स्थान पर तुम्हे मेरे साथ ही पूजा जायेगा। और क्योकि तुमने मेरी रक्षा बद्रीवृक्ष के रूप में की है, इसलिए आज से मुझे बद्री के नाथ अर्ताथ बद्रीनाथ के नाम से जाना जायेगा। 

 

श्री बद्रीनाथ जी की मूर्ति 

श्री बद्रीनाथ जी की मूर्ति शालीग्राम शिला से निर्मित है, इस मूर्ति की उचाई लगभग पौने तीन फ़ीट है। इस मूर्ति में मुखाकृति स्पष्ट नहीं है। इस मूर्ति में भगवान विष्णु पदमासन में विराजमान है, तथा तपस्या कर रहें है।  तपस्वियों की भांति भगवान विष्णु की भी जटाएँ बनी हुई है। इस मूर्ति में भगवान विष्णु के दो हाथ ऊपर उठे हुए है, तथा दो हाथ योग मुद्रा में स्थित है। मूर्ति पर जनेऊ स्पष्ट उभरी हुई दिखाई देती है। मूर्ति के वक्षस्थल पर बायीं ओर भृगुता (भृगु ऋषि ने भगवान विष्णु के वक्षस्थल पर लात मारी थी उसका निशान ) का चिन्ह बना हुआ है तथा दायीं ओर श्रीवत्स (भगवान शिव ने भगवान विष्णु पर युद्ध में त्रिशूल से प्रहार किया था उसका निशान) का चिन्ह बना हुआ है। भगवान विष्णु की यह मूर्ति स्यंभू है, तथा नारद कुंड से प्रकट हुई थी। शास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु आज भी यहाँ पर मूर्ति के रूप में योगमुद्रा में विराजमान है और तपस्या कर रहें है। 

 

श्री बद्रीनाथ मंदिर का वास्तुशिल्प 

श्री बद्रीनाथ मंदिर अलखनंदा नदी के तट पर स्थित है, यह मंदिर अलखनंदा नदी से लगभग 50 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इस मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार का मुख अलखनंदा नदी की ओर है। मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार को सिंह द्वार कहा जाता है, इस द्वार के शीर्ष पर तीन स्वर्ण कलश बने हुए है, तथा द्वार पर ही एक विशाल घंटी लटकी हुई है, इस द्वार तक पहुंचने ले लिए दोनों ओर विशाल सीढियाँ बनी हुई है। श्री बद्रीनाथ मंदिर के तीन मुख्य भाग हैं, जिन्हें सभा मंडप, दर्शन मंडप  गर्भगृह कहा जाता है। मंदिर के मुख्य  द्वार में प्रवेश करते ही सभा मंडप है, यह एक बड़ा हॉल है, जो आगे गर्भगृह की ओर जाता है, इस हॉल में बहुत से स्तंभ बने हुए है, जिनके ऊपर जटिल नक्काशी की गयी है, इस मंडप में बैठ कर श्रद्धालु विशेष पूजा और अनुष्ठान करते है। सभा मंडप में ही मंदिर के धर्माधिकारी, रावल और विद्वानों के बैठने के लिए स्थान बने हुए है। सभा मंडप के आगे दर्शन मंडप है, जहाँ से श्री बद्रीनाथ के दर्शन किये जाते है। दर्शन मंडप के आगे गर्भगृह स्थित है, जिसमे भगवान श्री बद्रीनाथ जी की शालिग्राम शिला से बनी मूर्ति स्थापित है। 

 

श्री बद्रीनाथ मंदिर में नारद कुंड और सूर्य कुंड नाम के दो कुंड स्थित है, इन्हे बहुत ही पवित्र माना जाता है, इन कुंडों का पानी बहुत अधिक गर्म रहता है। शास्त्रों के अनुसार नारद कुंड से ही श्री ब्रह्मा जी ने श्री बद्रीनाथ जी की मूर्ति निकाली थी। श्री बद्रीनाथ मंदिर के निचे तप्त कुंड स्थित है, इस कुंड के पानी का तापमान लगभग 55 डिग्री सेल्सियस रहता है। इस कुंड का पानी सल्फर युक्त है, जिसे औषधीय गुणों वाला माना जाता है। कई तीर्थयात्री मंदिर में श्री बद्रीनाथ के दर्शन करने से पहले इस कुंड में स्नान करतें है। 

 

श्री बद्रीनाथ मंदिर की अवस्थिति 

श्री बद्रीनाथ मंदिर उत्तराखंड राज्य के चमोली जिले की जोशीमठ तहसील में स्थित है, हिमालय पर्वत श्रंखला के जिस क्षेत्र में यह मंदिर स्थित है, उस क्षेत्र को गढ़वाल हिमालय के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर के आस-पास बसे नगर को बद्रीनाथपुरी कहा जाता है। यह मंदिर और बद्रीनाथपुरी नगर अलखनंदा और ऋषिगंगा नाम की दो नदियों के पवित्र संगम पर स्थित है। श्री बद्रीनाथ मंदिर के ठीक सामने अलखनंदा नदी के उस पार नर पर्वत स्थित है, जबकि मंदिर के पीछे नारायण पर्वत स्थित है। मंदिर के पश्चिम में 27 किलोमीटर दूर 7130 मीटर ऊंचा केदारनाथ पर्वत स्थित है। 

 

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